मनुष्य के मन में सदैव एक गहरा प्रश्न उठता है — भगवान जन्म क्यों लेते हैं? गर्भ से जन्म क्या बंधन है या मुक्ति? मुक्ति क्या है और अज्ञान क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने की कुंजी है।
भगवान का जन्म और जीव का जन्म
हिंदू दर्शन के अनुसार भगवान वास्तव में जन्म नहीं लेते, बल्कि प्रकट होते हैं। उनका प्राकट्य कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से होता है। जब धर्म की स्थापना या मानवता का मार्गदर्शन आवश्यक होता है, तब वे अवतार के रूप में गर्भ से जन्म लेते दिखाई देते हैं। यह जन्म लीला है, बंधन नहीं।
इसके विपरीत सामान्य जीव का जन्म कर्म का परिणाम होता है। पिछले कर्मों के अनुसार आत्मा नया शरीर धारण करती है। इसलिए जीव के लिए गर्भ संसार में प्रवेश का द्वार है — कर्म, अनुभव और पुनर्जन्म का चक्र।
इस प्रकार भगवान का जन्म स्वतंत्रता का प्रतीक है, जबकि जीव का जन्म बंधन का परिणाम।
गर्भ से जन्म — बंधन या मुक्ति?
जन्म स्वयं बंधन नहीं है। जन्म तो एक अवसर है।
अज्ञान की अवस्था में जन्म बंधन बन जाता है, क्योंकि मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर इच्छाओं, आसक्ति और कर्मों में उलझ जाता है। यही जन्म-मृत्यु का चक्र चलाता है।
परंतु ज्ञान की अवस्था में यही जन्म मुक्ति का साधन बन सकता है। मानव जीवन साधना, आत्मबोध और सत्य की प्राप्ति का माध्यम है। इसलिए जन्म का स्वरूप हमारी चेतना पर निर्भर करता है।
मुक्त अवस्था (मोक्ष)
मुक्ति का अर्थ है — जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता। यह वह अवस्था है जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है, कर्ता भाव मिट जाता है और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।
मुक्त व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी शरीर से बंधा नहीं होता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु उसके लिए समान हो जाते हैं। भीतर स्थायी शांति और कारण रहित आनंद का अनुभव होता है।
मुक्ति दो प्रकार की कही गई है — जीवनमुक्ति, जहाँ व्यक्ति जीवित रहते हुए मुक्त होता है, और विदेहमुक्ति, जहाँ शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता।
वास्तव में मुक्ति कहीं जाना नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
अज्ञान क्या है?
अज्ञान का अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है। अज्ञान का मूल है — स्वयं को गलत पहचानना।
जब मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, पद या संबंध मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल जाता है। अस्थायी वस्तुओं को स्थायी समझना, सुख को बाहरी वस्तुओं में खोजना और “मैं करता हूँ” का अहंकार — यही अज्ञान के रूप हैं।
उपनिषद कहते हैं कि आत्मा को न जानना ही अविद्या है। इसी अज्ञान से इच्छा, कर्म, बंधन और दुःख उत्पन्न होते हैं।
ज्ञान और अज्ञान का संबंध
अज्ञान अंधकार के समान है और ज्ञान प्रकाश के समान। जैसे प्रकाश आते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से अज्ञान मिट जाता है। सत्य नया उत्पन्न नहीं होता, केवल भ्रम समाप्त होता है।
निष्कर्ष
जीव का जन्म कर्म से बंधन है, भगवान का जन्म लीला है, और मानव जन्म मुक्ति का अवसर है। अज्ञान बंधन का कारण है और ज्ञान मुक्ति का मार्ग। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब जन्म और मृत्यु दोनों का भय समाप्त हो जाता है।
अंततः आध्यात्मिक यात्रा बाहर कुछ पाने की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की यात्रा
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