सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

🌹क्या है भैरवी यातना और कौन है भगवान कालभैरव ?🌹

🌹क्या है भैरवी यातना और कौन है भगवान कालभैरव ?🌹

`1-#हम_सभी_जानते_हैं_कि_हर_इंसान_जन्म_लेता_है, लेकिन ऐसा नहीं है कि आपका जन्म अचानक हो गया और एक बच्चे के रूप में दुनिया में आ गए। मां के गर्भ में आपका धीरे-धीरे विकास होता है। जीवन धीरे-धीरे शरीर में प्रवेश करता है और माता के शरीर से धीरे-धीरे आपका शरीर तैयार होता है ।आपने उसके एक हिस्से पर दखल कर लिया और वह हिस्सा आप बन गए।

 2- यह पूरी प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है। इसी तरह अगर किसी इंसान की मौत हो जाए और कुछ समय तक उसके मृत शरीर को रोककर रखा जाए तो आप देखेंगे कि उसके नाखून, उसके चेहरे और सिर के बाल 11 से 14
दिनों तक बढ़ते रहेंगे।कहने का मतलब यह है कि प्राण शरीर को एकदम से पूरी तरह नहीं छोड़ पाता जबकि व्यावहारिक रूप से इंसान की मौत हो जाती है।

3-मृत होने में उसे 11 से 14 दिन का समय लग जाता है।दुनिया के लिए तो इंसान अब नहीं रहा, लेकिन खुद अपने लिए वह अभी पूरी तरह मरा नहीं होता। मरने के बाद तमाम तरह के कर्मकांड और क्रियाएं जिस तरीके से की जाती हैं, उसके पीछे यही वजह है। जब आप शरीर का दाह संस्कार कर देते हैं तो सब कुछ तुरंत समाप्त हो जाता है।

4-काशी के मणिकर्णिका घाट पर  रोजाना औसतन 40 से 50 मृतकों का दाह संस्कार होता है। अगर आप वहां बैठ कर तीन दिन भी साधना कर लें तो आपको उस स्थान का असर समझ आ जाएगा। इसकी सीधी सी वजह यह है कि वहां बड़ी मात्रा में और बहुत वेग के साथ शरीरों से उर्जा बाहर निकल रही है। यह एक तरह से मानव-बलि की तरह है, क्योंकि ऊर्जा जबरदस्ती बाहर आ रही है। इसी के चलते वहां जबरदस्त मात्रा में ऊर्जा की मौजूदगी होती है।

5-यही वजह है कि भगवान शिव समेत कुछ खास किस्म के योगी हमेशा श्मशान घाट में साधना करते हैं, क्योंकि बिना किसी की जिंदगी को नुकसान पहुंचाए आप जीवन ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं।ऐसी जगहों पर खासकर तब जबर्दस्त ऊर्जा होती है, जब वहां आग जल रही हो। अग्नि की खासियत है कि यह अपने चारों ओर एक खास किस्म का प्रभामंडल पैदा कर देती है या आकाश तत्व की मौजूदगी का एहसास कराने लगती है। मानव के बोध के लिए आकाश तत्व बेहद महत्वपूर्ण है। जहां आकाश तत्व की अधिकता होती है, वहीं इंसान के भीतर बोध की क्षमता का विकास होता है।

6- मणिकर्णिका घाट पर  दो चीजें हो रही हैं। पहली चीज यह कि बहुत सारी ऊर्जा बाहर निकल रही है। प्राण का बचा हुआ हिस्सा बाहर निकल रहा है, क्योंकि शरीर, जो आधार है, उसी का नाश हो रहा है। और दूसरी यह कि वहां अग्नि की मौजूदगी भी है। जो लोग ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं,या जो लोग अपनी ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाना चाहते हैं, उनके लिए ये दोनों स्थितियां मिलकर एक बेहतरीन वातावरण पैदा कर देती हैं। श्मशान घाटों की यही खासियत रही है।

7-सद्‌गुरु के अनुसार ''ज्यादातर लोग शानदार तरीके से जी नहीं पाते। ऐसे में उनकी एक इच्छा होती है कि कम से कम उनकी मौत शानदार तरीके से हो। शानदार तरीके से मरने का मतलब है कि मौत के बाद सिर्फ शरीर का ही नाश न हो, बल्कि इंसान को परम मुक्ति मिल जाए। बस यही इच्छा लाखों लोगों को काशी खींच लाती है। इसी वजह से यह मृत्यु का शहर बन गया। लोग यहीं मरना चाहते हैं।''

8-मणिकर्णिका घाट के बराबर में ही कालभैरव मंदिर है। भैरव वह है जो आपको भय से दूर ले जाता है। काल मतलब समय यानि कालभैरव समय का भय है। यह मौत का भय नहीं है। भय का आधार समय है। अगर आपके पास असीमित समय होता तो कोई बात नहीं थी। लेकिन समय तो तेजी से भाग रहा है। अगर कुछ करना है, तो वक्त एक समस्या है, कुछ नहीं होता तो भी समस्या वक्त की ही है। बस इसीलिए है कालभैरव। अगर आप समय के भय से मुक्त हैं, तो आप भय से भी पूरी तरह से मुक्त हैं।

9-इस बात की पूरी गारंटी होती थी कि अगर आप काशी आते हैं तो आपको मुक्ति मिल जाएगी, भले ही पूरी जिंदगी आप एक बेहद घटिया इंसान ही क्यों न रहे हों। यह देखते हुए ऐसे तमाम घटिया लोगों ने काशी आना शुरू कर दिया, जिनकी पूरी जिंदगी गलत और बेकार के कामों को करते बीती। जिंदगी तो बिताई बुरे तरीके से, लेकिन वे मरना शानदार तरीके से चाहते थे।

10-तब यह जरूरी समझा गया कि ऐसे मामलों में कुछ तो रोक होनी चाहिए और इसीलिए ईश्वर ने कालभैरव का रूप ले लिया, जो भगवान शिव का प्राणनाशक रूप है जिसे भैरवी यातना भी कहते हैं। इसका मतलब है कि जब भी मौत का पल आता है, तो आप अपने कई जन्मों को एक पल में ही पूरी तीव्रता के साथ जी लेते है। जो भी परेशानी, कष्ट या आनंद आपके साथ घटित होना है, वो बस एक पल में ही घटित हो जाएगा।

11-हो सकता है, वे सब बातें कई जन्मों में घटित होने वाली हों, लेकिन वह सब मरने वाले के साथ माइक्रोसेकेंड में घटित हो जाएंगी, लेकिन इसकी तीव्रता इतनी जबरदस्त होगी कि उसे संभाला नहीं जा सकता। इसे ही भैरवी यातना कहा जाता है। यातना का अर्थ है जबरदस्त कष्ट, यानी जो कुछ आपके साथ नरक में होना है, वह सब आपके साथ यहीं हो जाएगा।

12-आपको जिस तरह का काम करना होता है, उसी तरह की आपकी वेशभूषा भी होनी चाहिए। तो भगवान शिव ने इस काम के हिसाब से वेशभूषा धारण की और इंसानों को भैरवी यातना देने के लिए कालभैरव बन गए। वह इतना जबरदस्त कष्ट देते हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन वह होता बस एक पल के लिए ही है ताकि उसके बाद अतीत का कुछ भी आपके भीतर बचा न रहे।
13-अगर एक तरीके से देखा जाए तो ध्यान करने की पूरी प्रक्रिया अपने आप में मृत्यु का एक  अनुकरण ही है। मृत्यु का मतलब है कि अब यह शरीर कोई समस्या नहीं रहा, और न ही अब कोई पक्षपाती या भेद-भाव करने वाला मन बचा है। आपके भेद-भाव से भरे विचार पिछले अनुभवों और प्रभावों का एक नतीजा है। किसी एक का विवेक दूसरे से बेहतर हो सकता हैं लेकिन यह चीजों को बांटने की ही कोशिश करता हैं , जो कुदरती तौर पर नहीं बंट सकती।

14-यह भेदभाव करने वाला विवेक दरअसल, परम अनुभूति से तात्कालिक अनुभूति तक आने का एक रास्ता है।पक्षपात करने वाली बुद्धि एक छलनी की तरह उन सारी चीजों को छानकर बाहर कर देती है, जिन्हें आप पसंद नहीं करते। और आपको करीब-करीब सारी सृष्टि ही नापसंद है.. जाहिर है, ऐसे में शिव को भी यह छलनी बाहर ही कर देगी।

16-जब  व्यक्ति शरीर में होता हैं , तो उसे कुछ सुनना गंवारा नहीं होता। मरने के बाद इंसान के पास भेद करने वाला मन नहीं रहता। इसलिए हम उस व्यक्ति के साथ ज्यादा
कुछ कर सकते हैं, जो अपनी भेद–भाव करने वाली बुद्धि खो चुका हो। अगर किसी की पक्षपात करने वाली बुद्धि चली गयी, तो इसका मतलब है कि उसके पास अब भेदभाव करने या भले-बुरे को अलग करने वाली छलनी नहीं रही।ऐसे में अब वह खुला मन हो चुका है, आप उसमें जो कुछ भरना या डालना चाहें डाल सकते हैं।

17-परन्तु मरने के बाद आप शरीर के लिए कुछ नहीं कर सकते। उसके लिए करने का कोई मतलब भी नहीं रह जाता। अगर कर्मकांड शरीर के लिए होता तो हम उसे तभी करते, जब इंसान जिंदा होता।कर्मकांड स्मृतियों के उस बुलबुले के लिए है, जो मरने के बाद किसी दूसरे शरीर की तलाश में अब तक इधर-उधर भटक रहा है।इसके पीछे का मकसद उस प्राणी में विवेक पैदा करना है ।

कौन है भगवान कालभैरव ?-

1-भ- से विश्व का भरण, र- से रमश, व- से वमन अर्थात सृष्टि को उत्पत्ति पालन और संहार करने वाले शिव ही भैरव हैं। भगवान शंकर के भैरव रूप को ही सृष्टि का संचालक बताया गया है।भैरव (शाब्दिक अर्थ- भयानक भैरव का अर्थ होता है - भय + रव = भैरव अर्थात् भय से रक्षा करनेवाला।) शैव धर्म में, वह शिव के विनाश से जुड़ा एक उग्र रूप है।त्रिक प्रणाली में भैरव परम ब्रह्म के पर्यायवाची, सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। आमतौर पर हिंदू धर्म में, भैरव को दंडपाणि भी कहा जाता है (जैसा कि वह पापियों को दंड देने के लिए एक छड़ी या डंडा रखते हैं) ।

 2-पुराणों के मतानुसार भैरव भगवान शिव का दूसरा नाम है। भैरव का वाहन श्वान है। भैरव का अर्थ भयानक और पोषक दोनों ही होता है। इनसे काल सहमा-सहमा रहता है।भगवान कालभैरव को तंत्र का देवता माना गया है। तंत्र शास्त्र के अनुसार,किसी भी सिद्धि के लिए भैरव की पूजा अनिवार्य है। इनकी कृपा के बिना तंत्र साधना अधूरी रहती है।

3-शिव उपसंहार के देवता भी हैं, अत: विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं।कालिका पुराण में भैरव को नंदी, भृंगी, महाकाल, वेताल की तरह भैरव को शिवजी का एक गण बताया गया है।इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं महाभैरव।

4-ध्यान के बिना साधक मूक सदृश है, भैरव साधना में भी ध्यान की अपनी विशिष्ट महत्ता है। किसी भी देवता के ध्यान में केवल निर्विकल्प-भाव की उपासना को ही ध्यान नहीं कहा जा सकता।भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं। ध्यान का अर्थ है - उस देवी-देवता का संपूर्ण आकार एक क्षण में मानस-पटल पर प्रतिबिम्बित होना।

5-भैरव जी के ध्यान हेतु इनके सात्विक, राजस व तामस रूपों का वर्णन अनेक शास्त्रों में मिलता है।जहां सात्विक ध्यान - अपमृत्यु का निवारक, आयु-आरोग्य व मोक्षफल की प्राप्ति कराता है, वहीं धर्म, अर्थ व काम की सिद्धि के लिए राजस ध्यान की उपादेयता है, इसी प्रकार कृत्या, भूत, ग्रहादि के द्वारा शत्रु का शमन करने वाला तामस ध्यान कहा गया है। ग्रंथों में लिखा है कि गृहस्थ को सदा भैरवजी के सात्विक ध्यान को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

6-भैरव-उपासना की दो शाखाएं- बटुक भैरव तथा काल भैरव के रूप में प्रसिद्ध हुईं। जहां बटुक भैरव अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात हैं वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए।ब्रह्मवैवत पुराण के  अनुसार आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव।

7-लेकिन इसी पुराण के 41वें अध्याय (गणपति- खंड)में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं।

8-शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है। इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है। ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है।तंत्रशास्त्र में अष्ट-भैरव का उल्लेख है ...

भगवान भैरव के 8 रूप ;-
 1-कपाल भैरव
*इस रूप में भगवान का शरीर चमकीला है, उनकी सवारी हाथी है । कपाल भैरव एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में तलवार तीसरे में शस्त्र और चौथे में पात्र पकड़े हैं। भैरव के इन रुप की पूजा अर्चना करने से कानूनी कारवाइयां बंद हो जाती है । अटके हुए कार्य पूरे होते हैं ।
 2-क्रोध भैरव
*क्रोध भैरव गहरे नीले रंग के शरीर वाले हैं और उनकी तीन आंखें हैं । भगवान के इस रुप का वाहन गरुण हैं और ये दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी माने जाते ह । क्रोध भैरव की पूजा-अर्चना करने से सभी परेशानियों और बुरे वक्त से लड़ने की क्षमता बढ़ती है ।
 3-असितांग भैरव
असितांग भैरव ने गले में सफेद कपालों की माला पहन रखी है और हाथ में भी एक कपाल धारण किए हैं । तीन आंखों वाले असितांग भैरव की सवारी हंस है । भगवान भैरव के इस रुप की पूजा-अर्चना करने से मनुष्य में कलात्मक क्षमताएं बढ़ती है ।
 4-चंद भैरव
इस रुप में भगवान की तीन आंखें हैं और सवारी मोर है ।चंद भैरव एक हाथ में तलवार और दूसरे में पात्र, तीसरे में तीर और चौथे हाथ में धनुष लिए हुए है। चंद भैरव की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलता हैं और हर बुरी परिस्थिति से लड़ने की क्षमता आती है ।
 5-गुरू भैरव
गुरु भैरव हाथ में कपाल, कुल्हाडी, और तलवार पकड़े हुए है ।यह भगवान का नग्न रुप है और उनकी सवारी बैल है।गुरु भैरव के शरीर पर सांप लिपटा हुआ है।गुरु भैरव की पूजा करने से अच्छी विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
 6-संहार भैरव
संहार भैरव नग्न रुप में है, और उनके सिर पर कपाल स्थापित है ।इनकी तीन आंखें हैं और वाहन कुत्ता है । संहार भैरव की आठ भुजाएं हैं और शरीर पर सांप लिपटा हुआ है ।इसकी पूजा करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते है ।
7;- उन्मत भैरव
उन्मत भैरव शांत स्वभाव का प्रतीक है । इनकी पूजा-अर्चना करने से मनुष्य की सारी नकारात्मकता और बुराइयां खत्म हो जाती है । भैरव के इस रुप का स्वरूप भी शांत और सुखद है । उन्मत भैरव के शरीर का रंग हल्का पीला हैं और उनका वाहन घोड़ा हैं।
 8- भीषण भैरव
भीषण भैरव की पूजा-अर्चना करने से बुरी आत्माओं और भूतों से छुटकारा मिलता है । भीषण भैरव अपने एक हाथ में कमल, दूसरे में त्रिशूल, तीसरे हाथ में तलवार और चौथे में एक पात्र पकड़े हुए है ।भीषण भैरव का वाहन शेर है ।

भगवान जन्म क्यों लेते हैं? गर्भ से जन्म क्या बंधन है या मुक्ति?

मनुष्य के मन में सदैव एक गहरा प्रश्न उठता है — भगवान जन्म क्यों लेते हैं? गर्भ से जन्म क्या बंधन है या मुक्ति? मुक्ति क्या है और अज्ञान क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने की कुंजी है।
भगवान का जन्म और जीव का जन्म
हिंदू दर्शन के अनुसार भगवान वास्तव में जन्म नहीं लेते, बल्कि प्रकट होते हैं। उनका प्राकट्य कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से होता है। जब धर्म की स्थापना या मानवता का मार्गदर्शन आवश्यक होता है, तब वे अवतार के रूप में गर्भ से जन्म लेते दिखाई देते हैं। यह जन्म लीला है, बंधन नहीं।
इसके विपरीत सामान्य जीव का जन्म कर्म का परिणाम होता है। पिछले कर्मों के अनुसार आत्मा नया शरीर धारण करती है। इसलिए जीव के लिए गर्भ संसार में प्रवेश का द्वार है — कर्म, अनुभव और पुनर्जन्म का चक्र।
इस प्रकार भगवान का जन्म स्वतंत्रता का प्रतीक है, जबकि जीव का जन्म बंधन का परिणाम।
गर्भ से जन्म — बंधन या मुक्ति?
जन्म स्वयं बंधन नहीं है। जन्म तो एक अवसर है।
अज्ञान की अवस्था में जन्म बंधन बन जाता है, क्योंकि मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर इच्छाओं, आसक्ति और कर्मों में उलझ जाता है। यही जन्म-मृत्यु का चक्र चलाता है।
परंतु ज्ञान की अवस्था में यही जन्म मुक्ति का साधन बन सकता है। मानव जीवन साधना, आत्मबोध और सत्य की प्राप्ति का माध्यम है। इसलिए जन्म का स्वरूप हमारी चेतना पर निर्भर करता है।
मुक्त अवस्था (मोक्ष)
मुक्ति का अर्थ है — जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता। यह वह अवस्था है जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है, कर्ता भाव मिट जाता है और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।
मुक्त व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी शरीर से बंधा नहीं होता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु उसके लिए समान हो जाते हैं। भीतर स्थायी शांति और कारण रहित आनंद का अनुभव होता है।
मुक्ति दो प्रकार की कही गई है — जीवनमुक्ति, जहाँ व्यक्ति जीवित रहते हुए मुक्त होता है, और विदेहमुक्ति, जहाँ शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता।
वास्तव में मुक्ति कहीं जाना नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
अज्ञान क्या है?
अज्ञान का अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है। अज्ञान का मूल है — स्वयं को गलत पहचानना।
जब मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, पद या संबंध मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल जाता है। अस्थायी वस्तुओं को स्थायी समझना, सुख को बाहरी वस्तुओं में खोजना और “मैं करता हूँ” का अहंकार — यही अज्ञान के रूप हैं।
उपनिषद कहते हैं कि आत्मा को न जानना ही अविद्या है। इसी अज्ञान से इच्छा, कर्म, बंधन और दुःख उत्पन्न होते हैं।
ज्ञान और अज्ञान का संबंध
अज्ञान अंधकार के समान है और ज्ञान प्रकाश के समान। जैसे प्रकाश आते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से अज्ञान मिट जाता है। सत्य नया उत्पन्न नहीं होता, केवल भ्रम समाप्त होता है।
निष्कर्ष
जीव का जन्म कर्म से बंधन है, भगवान का जन्म लीला है, और मानव जन्म मुक्ति का अवसर है। अज्ञान बंधन का कारण है और ज्ञान मुक्ति का मार्ग। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब जन्म और मृत्यु दोनों का भय समाप्त हो जाता है।
अंततः आध्यात्मिक यात्रा बाहर कुछ पाने की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की यात्रा 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

वास्तु शांति पूजा सामग्री

हल्दी कुंकुम गुलाल रंगोली चन्दन 50 ग्राम अगरबत्ती भीमसेनी कपूर 100 ग्राम जनेऊ अत्तार की शीशी नारियल जटावाले 8 चावल 2 किलो गेहूं 1 किलो सुपारी सफ़ेद 150 मिश्री 100 ग्राम चीनी 500 ग्राम गुड़ 200 ग्राम सूखा नारियल ४ मिक्स मिठाई 500 ग्राम गाय का घी 1 किलो पिली सरसो 50 ग्राम काले तिल ५० ग्राम उड़द 50 ग्राम सात प्रकार का अनाज (सवा सवा किलो ) 5 प्रकार के फल केले 12 छुट्टे फूल 1 किलो फूलो की माला 5 गुलाब के फूल 10 हवन लकड़ी 2 किलो गोबर के कंडे 4 पैकेट गायत्री हवन सामग्री 500 ग्राम कच्चा धागा बण्डल मौली बण्डल 160 (1 या 2 रूपये के सिक्के शहद 100 ग्राम आम के पत्ते ४ लोहे की कील 3 इंच लम्बे हवन कुंड या 16 ईंटे माचिस दिया नीरांजन घी में भीगी हुई बत्तिया 15 - 20 बाजोट 6 कलश के लिए ताम्बे के लोटे 5 6 ब्लाउज पीस (लाल, पीला, हरा, सफ़ेद 2 , नीला ) लाल सूती वस्त्र 1 मीटर सफ़ेद सूती वस्त्र 2 मीटर सुहाग का साहित्य 1 टॉवल नया 1 साडी सोने की अथवा चांदी की वास्तु प्रतिमा सोने की शलाका पंचरत्न

रविवार, 2 नवंबर 2025

दिल के नैना देख उघार , घट में पावेगा दिलदार ।। धृ।। बैठ एकांत शोध कर पूरा प्रवृत्ति को कर दे दुरा निवृत्ति में सुरति धार ।। १।। छूट जावे माया का थारा मिट जायेगा घोर अँधेरा फिर दिलदार की सूरत निहार ।। २।। दल ऊपर दल चढ़ जा ख़ासा आखरी दल पर कर ले बासा अनहद नाद की सुन झंकार ।। ३।। लालदास का वो रखवारा श्याम सलोना सुन्दर प्यारा मिल उनसे हो बेड़ापार ।। 4

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने

रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है, जो पेड़ हमने लगाया पहले, उसी का फल हम अब पा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ इसी धरा से शरीर पाए, इसी धरा में फिर सब समाए, है सत्य नियम यही धरा का, है सत्य नियम यही धरा का, एक आ रहे है एक जा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ जिन्होने भेजा जगत में जाना, तय कर दिया लौट के फिर से आना, जो भेजने वाले है यहाँ पे, जो भेजने वाले है यहाँ पे, वही तो वापस बुला रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ बैठे है जो धान की बालियो में, समाए मेहंदी की लालियो में, हर डाल हर पत्ते में समाकर, हर डाल हर पत्ते में समाकर, गुल रंग बिरंगे खिला रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है, जो पेड़ हमने लगाया पहले, उसी का फल हम अब पा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥

दिल खो गया श्री वुन्दावन में

दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया 
बांके बिहारी श्री वृन्दावन में हाय मेरा दिल खो गया

होता नित रास यहाँ संतो का वास यहाँ 
सदा भाव और भक्ति का अहसास यहाँ 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।१।। 

यहाँ यमुना किनारा है श्री निधिवन प्यारा है 
कण कण में बिहारी जी, यहाँ तेरा नजारा है 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।। २।। 

देखा जबसे तुमको मैं हो गया दीवाना 
नहीं होश रहा कोई हुआ खुद से बेगाना 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।३।। 

कहे निखिल सौरभ प्यारे कभी दिल से ना बिसराना
निखिल बस तेरा है हर जनम में अपना लेना 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।४ ।।

शनिवार, 2 सितंबर 2023

सिद्ध मंत्र साधना

ॐ 

ॐ नमो सिद्धाय सर्व अरिष्ट निवारनाय
सर्व कार्य सिद्ध कराय ॐ सिद्धाय नमः

ॐ सिद्ध गणेशाय नमः
ॐ सिद्ध सरस्वती माताय नमः
ॐ सिद्धेश्वराय नमः
ॐ सिद्धेश्वरी माताय नमः
ॐ सिद्ध विष्णु देवाय नमः
ॐ सिद्ध महालक्ष्मी माताय नमः
ॐ सिद्ध दत्तात्रेयाय नमः
ॐ सिद्ध गोरक्षनाथाय नमः
ॐ सिद्ध स्वामी हरदासाय नमः
ॐ सिद्ध गुरुदेवाय नमः
ॐ सिद्धाय नमः

ॐ नमो सिद्धाय सर्व अरिष्ट निवारनाय
सर्व कार्य सिद्ध कराय ॐ सिद्धाय नमः

ॐ नमो सिद्धाय सर्व समर्थाय
संसार सर्व दुःख क्षय कराय
सत्व गुण आत्मबल दायकाय, मनो वांछित फल प्रदायकाय
ॐ सिद्ध सिद्धेश्वराय नमः

सिद्ध सिद्धेश्वर शांति दायक तू शांतिदायक तू
सुख कारक सिद्ध विघ्न हर तू सिद्ध विघ्न हर तू
सिद्धियों के ईश्वर सिद्धेश्वर तू सिद्धेश्वर तू
रिद्धि सिद्धि दायक सिद्ध गुरु तू सिद्ध गुरु तू
श्रद्धा भक्ति दायक सिद्ध साईं तू सिद्ध साई तू
कृपा छत्र दाता सिद्ध गोरक्ष तू सिद्ध गोरक्ष तू
सिद्ध सिद्धेश्वर शांति दायक तू शांतिदायक तू

ॐ शांति शांति शांति