बुधवार, 12 मई 2021

#नेहरु का #साम्प्रदायिक_सदभाव जब सरदार पटेल जी के प्रयासों से #सोमनाथ मंदिर 1951 में बनकर तैयार हुआ तो सरदार पटेल जी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी से मंदिर का उद्घाटन करने का अनुरोध किया. जिसे राजेन्द्र बाबू ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. साथ ही सरदार पटेल जी ने नेहरू जी से भी पत्र लिखकर इस समारोह में भाग लेने की अपील की लेकिन नेहरु जिसे कांग्रेसी भारत के "शिल्पी " आदि ना जाने किन किन अलंकारों से नवाजते है उसने अपनी गन्दी और तुच्छ मानसिकता का परिचय देते हुए सिर्फ वोट बैंक की खातिर सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कहा की वो किसी भी ऐसे समारोह में नहीं जाते जिसे देश का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़े और नेहरु ने राजेन्द्र बाबू से भी पत्र लिखकर सोमनाथ के उद्घाटन समारोह में ना जाने की अपील की जिसे राजेन्द्र बाबू ने अस्वीकार कर दिया लेकिन चूँकि भारत में प्रधानमंत्री सत्ता का केन्द्र है इसलिए राजेंद्र बाबू ने नेहरु का मान रखते हुए सरकारी खर्च के बजाय निजी पैसे से समारोह में सिरकत की . उन्होंने फ्रंटियर मेल ट्रेन से बडौदा फिर बरोड़ा से सोमनाथ पहुचे . जबकि देश के राष्ट्रपति को विशेष ट्रेन और जहाज़ की सुबिधा है . जबकि नेहरु लखनऊ के इस्लामिक कालेज, अजमेर दरगाह और देवबंद के दारुल उलूम के कई समारोहों में एक प्रधानमंत्री के तौर पर शिरकत किया था. क्या तब नेहरु को इस देश की साम्प्रदायिक सदभाव का ख्याल नहीं था ? यदि आज़ादी के बाद से ही देश के सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से माना गया होता तो आज देश एक बारूद का ढेर ना बना होता।असल में वर्तमान में कांग्रेस नेहरु के ही वोट बैंक के तुष्टीकरण की नीति को ही आगे बढा रही है

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