*वैष्णवता 2*
*कोई हमसे पूछ सकता है की, किसी का बाह्य स्वरूप इतना आवश्यक क्यों है? शास्त्रों में दिए गए बाह्य स्वरुप के बिना ही मैं श्रीवैष्णव क्यों नहीं बन सकता?” यह एक उच्च कोटि के श्री वैष्णव के लिये सम्भव हो सकता है, लेकिन साधारण मनुष्यों के लिये नहीं। हमारे लिये शास्त्र ने कुछ नियम बनाये हैं और हमें उनका पालन करना अत्यंत आवश्यक है| एक लौकिक उदाहरण है– जब एक सिपाही अपने कर्तव्य में अच्छी तरह वरदी पहनता है, तो उस देश का कानून उसे कुछ ताकत देता है।*
*परन्तु वह यह नहीं कह सकता कि मैं सिपाही हूँ मुझे अपने कर्तव्य के दौरान वर्दी की क्या जरुरत है? मेरे दिल मे है देश प्रेम, मुझे वर्दी की क्या जरूरत? ऐसा कोई सेना का जवान कह सकता है क्या? कुछ विशेष लोगो के लिये यह अपवाद हो सकता परंतु अगर वो यह वरदी नहीं पहनता तो उसे वह मान–सम्मान नहीं मिल सकेगा। न उसमे वो गुण, अपने कार्य के प्रति वो सकारात्मकता निर्माण होगी। और चिंता की बात तो यह है कि काम–काज़ के लिए वर्दी पहनने में किसी को कोई संकोच नहीं होता है मगर शास्त्रों में दिए गए आज्ञाओं के पालन करने में ही संकोच होता है| यही दुःख की बात है|*
*वैष्णव एक अनंत तत्त्व ज्ञान है और इसमे श्रीमननारायण इन तथ्यो का केंद्र बनकर स्थापित हैं। वे पूरे मंगल गुण से भरपूर हैं। वे इस नित्य विभूती और लीला विभूती के मालिक हैं। तत्त्वत्रय ज्ञान के अनुसार ये तीन संस्थाएं मुख्य माना जाता है – ईश्वर, चित और अचित। ईश्वर दोनो चित और अचित के मालिक हैं। इन दोनो नित्य विभूति और लीला विभूति में अनगिनत जीव हैं। यह तत्त्व ज्ञान और सिद्धांत सब शास्त्र (वेद, उपनिषद, इतिहास, पुराण, पञ्चतंत्र आचार्यों की श्रीसूक्ति आदि) पर आधारित हैं। यह शास्त्र विशेषकर चित के लिये ही हैं और यह शास्त्र इस चित को इस लीला विभूति (इसे श्रीभगवद गीता में अशाश्वत और दु:खकालयम बताया गया है) से श्रीवैकुण्ठ (वह जगह जहाँ कोई दु:ख नहीं है केवल सुख ही सुख है) जाने के लिये मदद करता है। यह प्रक्रिया जिससे इस चितयात्रा का प्रारम्भ होता है ( लीला विभूति से नित्य विभूति को ), उसे पञ्च संस्कार कहते हैं।*
*एक श्रीवैष्णव कैसे बनना चाहिए?*
*हमारे पूर्वाचार्यों के अनुसार एक व्यवस्थित संस्कार (प्रक्रिया) जहाँ एक कोई भी श्रीवैष्णव बनता है, उस विधि को “पञ्च संस्कार” कहते हैं।*
*संस्कार एक शुद्ध या निर्मल करने की विधी है। यह एक विधि है जहाँ किसी का रुप परिवर्तन एक अशिक्षित दशा / अवस्था से शिक्षित दशा में होती है। यही वह विधि है जहाँ कोई पहले श्रीवैष्णव बनता है। जैसे कोइ अगर ब्राह्मण परिवार में जन्म लेता है तो उसे ब्रम्ह विधि से गुजर कर ब्राम्हण बनना आसान हो जाता है। उसी तरह एक श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेकर उसे पञ्च संस्कार कि विधि से श्रीवैष्णव बनना आसान हो जाता है। वैष्णव आत्मा से जुडा है और ब्राम्हण किसी के शरीर से जुडा है। और एक बहुत जरूरी बात वैष्णवों के लिये यह है कि वह पूरी तरह अपने आप को देवतान्तरों से (देवता याने ब्रम्हा, शिवजी, दुर्गा, सुब्रमन्य, इन्द्र, वरुण आदि जो कि पूरी तरह भगवान श्रीमन्नारायण के नियंत्रण में हैं) और जो देवतान्तरों से संबंधित कार्य है उससे दूर रहे।*
*पञ्च संस्कार*
*पञ्च संस्कार/ समाश्रय, इसे शास्त्र बताता है कि यह एक विधि है जहाँ एक व्यक्ति को श्रीवैष्णव बनाया जाता है।*
*पँचसंस्कार का महत्व कल के लेख में*
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