रविवार, 12 सितंबर 2021

वैष्णव सम्प्रदाय


*वैष्णव सम्प्रदाय, भगवान विष्णु को ईश्वर मानने वालों का सम्प्रदाय है. वैष्णव धर्म या वैष्णव सम्प्रदाय का प्राचीन नाम भागवत धर्म या पांचरात्र मत है.इस सम्प्रदाय के प्रधान उपास्य देव वासुदेव हैं, जिन्‍हें, ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, ऐश्वर्य और तेज- इन 6: गुणों से सम्पन्न होने के कारण भगवान या 'भगवत' धर्म कहा गया है*

*स्वयम को सेक्युलर समझनेवाले, सब का खून लाल होता है, जाती पाती मनुष्य निर्मित है, सब एक है, ऐसे मत रखनेवाले दोगले इस विषय से दूर ही रहे। न तो ऐसे लोगो को कोई जवाब दिया जायेगा न तर्क कुतर्क*

*वैष्णवता -१*

*अपने पूर्वाचार्यों के बहुत से ग्रन्थो में बहुत सी जगह श्री वैष्णवों के लक्षणो के बारे में उल्लेख किया है। इसी संदर्भ में हमें अपने पूर्वाचार्यों के ग्रन्थों में बहुत से उदाहरण मिलेंगे।*

*पद्म पुराण में एक मौलिक प्रमाण दिया गया है जिसे हमारे पूर्वाचार्यों ने अपने ग्रंथों में उपयोग किया है –*

*ये कण्ठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला ये बाहुमूल परिच्रिन्हत शंख चक्रा |*
*ये वा ललाट पटले लसदुर्ध्वपुण्ड्रा ते वैष्णवा भुवनमाशु पवित्र यन्ति ॥*

*यह पूरा श्लोक हमें स्पष्टता से बताता है कि एक श्रीवैष्णव का पूर्ण बाह्य स्वरूप किस तरह होता है और कैसे वह उस जगह को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुद्ध करता है।*

*जिसके गले में तुलसी और कमलाक्ष की माला, (भगवान, पूर्वाचार्य, आचार्य इनके द्वारा धारण किये गये पवित्र माला) जिनके कंधों में भगवान श्रीमन नारायण के चिन्ह शंख–चक्र अंकित है (पञ्च–संस्कार की एक विधि) और ललाट पर सच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र विराजमान है (मतसम्प्रदाय के गुरू का दिया हुआ चिन्ह गौरव सहित धारण करना चाहिए। श्री वैष्णवों को (मृतिका) पासा का सुन्दर सच्छिद्र अपने ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करके उसको अलंकृत करने के लिये (बीच में) हरिद्रा का श्री धारण करना चाहिए। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक में ये खडी दोनो रेखाऐ शरणागती का प्रतीक हैं। ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक भगवान के श्रीचरण कमल हैं और बीच में स्थित लक्ष्मीजी का स्थान है। हमारे पूर्वाचार्य तो हमेशा द्वादश तिलक धारण करते थे और करते आये हैं । ऎसे श्री वैष्णव, वातावरण को और वहाँ रहनेवाले मनुष्य दोनों को शुध्द करता है।*
*(अब आज 12 जगह पर तिलक लगाना भले अप्रासंगिक लग रहा हो, पर कम से कम मस्तिष्क पर तो तिलक लगाया जा सकता है न?)*

*हमारे पूर्वाचार्यों ने सदैव अपने बाह्य स्वरूप को मुख्य स्थान दिया है और सदैव यह खयाल रखा है कि किसी भी परिस्थिती में अपने स्वरूपानरूप बाह्य स्वरूप का पूरा ध्यान रखें। बाह्य स्वरूप ही श्रीवैष्णवों की मुख्य पहचान है। अब लोग कहते है कि बाह्य लक्षण पाखंड है। वैष्णवता तो अंदर से होती है लेकिन सिर्फ एक परम श्रीवैष्णव ही दूसरे वैष्णवों को बिना बाह्य स्वरूप के आंतरिक स्वरूप से पहचान सकता है (परम् वैष्णव उसको कहते है जिसको गुरु कृपा से दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई हो। जो परम भागवतो में होती है, सामान्य जन में नहीं!) देखते ही अपनी पहचान हो ऐसा वैष्णवता का लक्षण हमारा तिलक ही हो सकता है।*

*हमारे बाह्य लक्षण कम कम करते करते आज हम शून्य पर आ गये है। आज हमारे पास एक भी लक्षण नही बचा।*

*शेष भाग कल*

*संकलन-राजेन्द्र वैष्णव, औरंगाबाद महाराष्ट्र*
*8055555051*

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