बुधवार, 12 मई 2021

वेद और मानव सभ्यता #वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं।वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रखी हुई हैं।इन्हे यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है.यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है। वेद के चार विभाग है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद,इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र,अर्थशास्त्र,कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई। #ऋग्वेद- इसमें पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है। #यजुर्वेद -यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। यह वेद गद्य मय है। #सामवेद- साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। #अथर्वदेव- थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है।अथर्वदेव सबसे बड़ा वेद है इसके दो खंड है नीचे दिए गए लिंक पर डावनलोड करके इसका अध्ययन कर सकते है https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/rigved.pdf https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/yajurved.pdf https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/samved.pdf https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/arthved-part-1.pdf https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/atharva-2.pdf
जद्दनबाई आज़ादी के पहले की बात है एक तवायफ थी #जद्दनबाई बेहद सुन्दर,बनारस में चौक थाने के पास जद्दन कि महफ़िल सजती थी। नामचीन हस्तियों कि आवक थी उसके कोठे पर।नवाबज़ादे, सेठ, ठाकुर, अंग्रेज साहब आते रहे और देखते ही देखते जद्दनबाई की गोद में तीन फूल खिला गए, भैया सही आँकड़े पता नहीं हैं, हा तीनों के ही पिता अलग-2 थे इनमें से नरगिस एक हिन्दू मोहन बाबू कि संतान थी बाकी दो का पता नहीं। जद्दनबाई तवायफ थी मगर दूरदर्शी महिला थी उसने वक्त की नब्ज़ पढ़ ली कि दो बेटे और एक बेटी के साथ इस कोठे पर कोई भविष्य नहीं है। कल बेटी तवायफ बनेगी और उसके भाई उसकी दलाली खाएंगे। जद्दनबाई ने मुंबई की गाड़ी पकड़ ली और बच्चों के साथ मुंबई आ गई। सर छुपाने की जगह मिल गई और धंधा भी,वही पुराना वाला हा कुछ 2- 3 फिल्मों में गाना भी गाई। बेटी नरगिस को उसने फिल्मों में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अपने पहचान के लोगों से मदद लेकर उभरते हुए बॉलीवुड में प्रवेश करवा दिया।नरगिस एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री साबित हुई और नई दूकान अच्छी तरह चल निकली। भाई लोगों को भी जूनियर आर्टिस्ट टाइप रोल मिलने लगे। इसी समय लाहौरी लाला राज कपूर के नैना नरगिस से लड़ गए और फिर ये कहानी लंबी चली। पृथ्वीराज कपूर को तवायफ की बेटी अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं हुई और ये इश्क आधे रास्ते में ही निपट गया।तबतक राज कपूर और नरगिस के संबंध में बस विवाह की औपचारिकता बाकी थी। बाकी सब कुछ हो चुका था। जबलपुर की घरेलू लड़की कृष्णा से विवाह कर राज कपूर ने कल्टी मार ली। नरगिस फोकट में लुटीपिटी भौंचक्की देखती रही। इसके बाद उसका कैरियर ढलान पर आने लगा । अपनी संध्या वेला में उसने ख़्वाजा अहमद अब्बास की कालजयी रचना #मदरइंडिया की। इसमें उसके पुत्र की भूमिका निभाई थी तब के दमदार अभिनेता #सुनीलदत्त ने। फिल्म के एक दृश्य में आग में घिरने का सीन शूट करते हुए नरगिस सचमुच आग में घिर गई। तब सुनील दत्त ने जान पर खेल कर उसको बचाया। इसके बाद परदे पर मां बेटे को प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। नरगिस सुनील दत्त से उम्र में खासी बड़ी थी। सुनील दत्त पंजाब के हुसैनी ब्राह्मण परिवार से हैं। हुसैनी ब्राह्मण वो लोग हैं जो कर्बला के युद्ध में हसन हुसैन की तरफ से वीरता से लड़े थे। ये भारत से वहाँ गए थे।सुनील दत्त के परिवार को ये बेहूदा रिश्ता हजम नहीं हो सका होगा इसलिये आजतक उनके बारे में कोई चर्चा नहीं होती। दो मुसलमान मामाओं और उनके मित्रों की परवरिश से सुनील दत्त का बेटा #संजय_दत्तहिंदुओं के प्रति घृणा पालते हुए बड़ा हुआ। नरगिस की मौत पर इन लोगों ने उसे हिंदू सुहागिन की तरह अंत्येष्टि प्राप्त नहीं होने दी और जद्दनबाई की कब्र के पास दफनाने को लेकर शवयात्रा में ही बवाल खड़ा कर दिया। संजय दत्त अपने मामाओं के साथ था। बाबरी विध्वंस के समय संजय दत्त के मन में हिंदुओं के लिए घृणा का उफान था और उसने दाउद इब्राहिम के विस्फोटक सामग्री से लदे दो ट्रक एक रात के लिए अपने यहाँ छुपाए। बदले में उसे दो ए.के. 47 गिफ्ट दी गई।संजय की गिरफ्तारी के बाद सुनील दत्त काफी टूट गए थे बाला साहेब ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था सूनिल मेरे टेरेंस पर रोज बियर,चने और आंसूओं के साथ बैठा रहता था मैं उसे इतना तड़पता देखता रहता था।
#नेहरु का #साम्प्रदायिक_सदभाव जब सरदार पटेल जी के प्रयासों से #सोमनाथ मंदिर 1951 में बनकर तैयार हुआ तो सरदार पटेल जी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी से मंदिर का उद्घाटन करने का अनुरोध किया. जिसे राजेन्द्र बाबू ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. साथ ही सरदार पटेल जी ने नेहरू जी से भी पत्र लिखकर इस समारोह में भाग लेने की अपील की लेकिन नेहरु जिसे कांग्रेसी भारत के "शिल्पी " आदि ना जाने किन किन अलंकारों से नवाजते है उसने अपनी गन्दी और तुच्छ मानसिकता का परिचय देते हुए सिर्फ वोट बैंक की खातिर सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कहा की वो किसी भी ऐसे समारोह में नहीं जाते जिसे देश का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़े और नेहरु ने राजेन्द्र बाबू से भी पत्र लिखकर सोमनाथ के उद्घाटन समारोह में ना जाने की अपील की जिसे राजेन्द्र बाबू ने अस्वीकार कर दिया लेकिन चूँकि भारत में प्रधानमंत्री सत्ता का केन्द्र है इसलिए राजेंद्र बाबू ने नेहरु का मान रखते हुए सरकारी खर्च के बजाय निजी पैसे से समारोह में सिरकत की . उन्होंने फ्रंटियर मेल ट्रेन से बडौदा फिर बरोड़ा से सोमनाथ पहुचे . जबकि देश के राष्ट्रपति को विशेष ट्रेन और जहाज़ की सुबिधा है . जबकि नेहरु लखनऊ के इस्लामिक कालेज, अजमेर दरगाह और देवबंद के दारुल उलूम के कई समारोहों में एक प्रधानमंत्री के तौर पर शिरकत किया था. क्या तब नेहरु को इस देश की साम्प्रदायिक सदभाव का ख्याल नहीं था ? यदि आज़ादी के बाद से ही देश के सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से माना गया होता तो आज देश एक बारूद का ढेर ना बना होता।असल में वर्तमान में कांग्रेस नेहरु के ही वोट बैंक के तुष्टीकरण की नीति को ही आगे बढा रही है
#मनु #इस्लाम #गांधी और #हीरालाल महात्मा गांधी के पुत्र हीरालाल गांधी इस्लाम अपना कर अब्दुल्लाह बने और अपनी बेटी मनु को बीबी बनाने पर तुल गये अब्दुल्लाह, यह मैं क्या सुन रहा हूं कि तुम्हारी यह सात साल की छोकरी आर्य समाज मंदिर में हवन करने जाती है?'' जकारिया साहिब ने अब्दुल्लाह के घर की बैठक में बैठे हुए रोष भरे शब्दों में कहा, ''यह अब तक मुस्लिम क्यों नहीं बनी, इसे भी बनाइए, यदि इसे मुस्लिम नहीं बनाया गया तो इसका तुमसे कुछ भी संबंध नहीं है। हीरालाल उर्फ अब्दुल्लाह ने 27 जून 1936 को नागपुर में इस्लाम कबूल किया था और 29 जून 1936 को मुंबई में इसकी सार्वजनिक घोषणा की, और 1 जुलाई 1936 को यह घटना घट गई। हीरालाल पर इस्लाम का रंग चढ़ गया था और हर हाल में पूरे हिंदुस्तान को इस्लामी देश बनाना चाहता था। वह जकारिया के सवाल का कुछ जवाब नहीं दे पाया । तभी जकारिया ने अब्दुल्लाह की मासूम बेटी मनु जो उस समय सात साल की थी, उसकी ओर मुखातिब होकर कहा, ''क्यों तुम इस्लाम कबूल नहीं करोगी?'' मनु- ''नहीं मैं इस्लाम कबूल नहीं करूंगी!' ''यदि तुम इस्लाम कबूल नहीं करोगी तो तुम्हें मुंबई की चैपाटी पर नंगी करके तुम्हारी बोटी-बोटी करके चील और कव्वो को खिला दी जाएगी,'' फिर वे अब्दुल्लाह( हीरालाल) को चेतावनी देने लगे- ए, ''अब्दुल्ला काफिर लड़कियां और औरतें अल्लाह की ओर मुस्लिमों को दी गई नेमतें हैं...देखो यदि तुम्हारी बेटी इस्लाम कबूल नहीं करती तो तुम्हें इसको रखैल समझकर भोग करने का पूरा हक है, क्योंकि जो माली पेड़ लगाता है उसे फल खाने का भी अधिकार है, यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो हम ही इस फल को चैराहे पर सामूहिक रूप से चखेंगे। हमें हर हाल में हिन्दुस्तान को मुस्लिम देश बनाना है और पहले हम लोहे को लोहे से ही काटना चाहते हैं।'' कहकर वह चला गया था और उसी रात अब्दुल्लाह ने अपनी नाबालिग बेटी की नथ तोड़ डाली थी ( अर्थात अपनी हब्स का शिकार बनाआ)। बेटी के लिए पिता भगवान होता है, लेकिन यहां तो बेटी के लिए पिता शैतान बन गया था। मनु को कई दिन तक रक्तस्राव होता रहा और उसे डाॅक्टर से इलाज तक करवाना पड़ा। जब मनु पीड़ा से कराहने लगी तो उसने अपने दादा महात्मा गांधी को खत लिखा, जो बापू के नाम से सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुका था, लेकिन बापू ने साफ कह दिया कि इसमें मैं क्या कर सकता हूं? इसके बाद मनु ने अपनी दादी कस्तूरबा को खत लिखा, खत पढ़कर दादी बा की रूह कांप गई, ''हाय मेरी फूल सी पौती के साथ यह कुकर्म और वह भी पिता द्वारा. बा ने 27 सितंबर 1936 को अपने बेटे अब्दुल्लाह को पत्र लिखा और बेटी के साथ कुकर्म न करने की अपील की और साथ ही पूछा कि 'तुमने धर्म क्यों बदल लिया? और गोमांस क्यों खाने लगे?' बा ने बापू से कहा, ''अपना बेटा हीरा मुस्लिम बन गया है, तुम्हें आर्य समाज की मदद से उसे दोबारा शुद्धि संस्कार करके हिन्दू बना लेना चाहिए।'' बापू- ''यह असंभव है!'' बा- ''क्यों?'' बापू- ''देखो मैं शुद्धि आंदोलन का विरोधी हूं, जब स्वामी श्रद्धानंद ने मलकाने मुस्लिम राजपूतों को शुद्धि करके हिन्दू बनाने का अभियान चलाया था तो उस अभियान को रोकने के लिए मैंने ही आचार्य बिनोबा भावे को वहां भेजा था और मेरे कहने पर ही बिनोबा भावे ने भूख हड़ताल की थी और अनेक हिन्दुओं को मुस्लिम बनाकर ही दम लिया था, मुझे इस्लाम अपनाने में बेटे के अंदर कोई बुराई नहीं लगती, इससे वह शराब का सेवन करना छोड़ देगा।'' ''शराब का सेवन करना छोड़ देगा,'' बा ने कहा, ''वह तो अपनी ही बेटी से बीवी जैसा बर्ताव करता है।'' ''अरे नहीं ब्रह्मचर्य के प्रयोग कर रहा होगा, हम भी अनेक औरतों और लड़कियों के संग नग्न सो जाते हैं और अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा करते हैं।'' ''तुम्हारे और तुम्हारे बेटे के कुकर्म पर मैं शर्मिंदा हूं।'' कहते हुए वह घर से निकल पड़ी थी और सीधे पहुंची थी आर्यसमाज बम्बई के नेता श्री विजयशंकर भट्ट के द्वार पर और आवाज लगाई थी साड़ी का पल्ला फैलाकर, ''क्या अभागन औरत को भिक्षा मिलेगी?'' विजयशंकर भट्ट बाहर आए और देखकर चौंक गए कि बा उनके घर के द्वार पर भिक्षा मांग रही है, ''मां क्या चाहिए तुम्हें?'' ''मुझे मेरा बेटा लाकर दे दो, वह विधर्मियों के चंगुल में फंस गया है और अपनी ही बेटी को सता रहा है।'' ''मां आप निश्चित रहें आपको यह भिक्षा अवश्य मिलेगी।'' ''अच्छी बात है, तब तक मैं अपने घर नहीं जाउंगी।'' कहते हुए बा ने उनके ही घर में डेरा डाल लिया था। श्री विजयशंकर भट्ट ने अब्दुल्लाह की उपस्थिति में वेदों की इस्लाम पर श्रेष्ठता विषय पर दो व्याख्यान दिए, जिन्हें सुनकर अब्दुल्लाह को आत्मग्लानि हुई कि वह मुस्लिम क्यों बन गया। फिर अब्बदुल्लाह को स्वामी दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को दिया गया। जिसका असर यह हुआ कि जल्द ही बम्बई में खुले मैदान में हजारों की भीड़ के सामने, अपनी मां कस्तूरबा और अपने भाइयों के समक्ष आर्य समाज द्वारा अब्दुल्लाह को शुद्ध कर वापिस हीरालाल गांधी बनाया गया।महात्मा गांधी को जब यह पता चला तो उन्हें दुख हुआ कि उनका बेटा क्यों दोबारा काफिर बन गया और उन्होंने बा को बहुत डांटा कि तुम क्यों आर्य समाज की शरण में गई...बा को पति की प्रताड़ना से दुख पहुंचा और वह बीमार रहने लगी। कस्तूरबा को ब्राॅन्काइटिस की शिकायत होने लगी थी, एक दिन उन्हें दो दिल के दौरे पड़े और इसके बाद निमोनिया हो गया। इन तीन बीमारियों के चलते बा की हालत बहुत खराब हो गई। डाॅक्टर चाहते थे बा को पेंसिलिन का इंजेक्शन दिया जाए, लेकिन वह इंजेक्शन उस समय भारत के किसी अस्पताल में नहीं था। बात गवर्नर तक पहुंचती और उन्होंने विशेष जहाज द्वारा विलायत से इंजेक्शन मंगाया। लेकिन बापू इसके खिलाफ थे कि इंजेक्शन लगाया जाए। बापू इलाज के इस तरीके को हिंसा मानते थे और प्राकृतिक तरीकों पर ही भरोसा करते थे। बा ने कहा कि अगर बापू कह दें तो वो इंजेक्शन ले लेंगी। लेकिन बापू ने कहा कि 'वो नहीं कहेंगे, अगर बा चाहें तो अपनी मर्जी से इलाज ले सकती हैं।' जीवन की आशाभरी दृष्टि से बा बेहोश हो गई और बापू ने उनकी मर्जी के बिना इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया। एक समय के बाद गांधी ने सारी चीजें ऊपरवाले पर छोड़ दीं। 22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि के दिन बा इस दुनिया से चली गईं। कालांतर में मनु का विवाह एक कपड़ा व्यवसायी सुरेन्द्र मशरुवाला से हुआ, जो आर्य समाजी थे और जिस दिन वे ससुराल में चली तो पिता ने यही कहा था, ''बेटी मुझे क्षमा कर देना।'' ''आकाश कहां तक है उसकी कोई थाह नहीं है और मैं अपने पंखो से उड़कर कहीं भी जा सकती हूं, यह मेरी योग्यता पर निर्भर करता है, उड़ते हुए मुझे पीछे नहीं देखना है।'' उसने क्षमा किया या नहीं नहीं पता, लेकिन विदाई पर यही कहा था। अब्दुल्लाह से हीरालाल बने बापू के पुत्र स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि सभा के कार्यकर्ता बन गए और मरते दम तक गैर हिन्दुओं को हिन्दू बनाने के कार्यक्रम से जुड़े रहे, लेकिन उनकी गर्दन कभी उंची नहीं हुई, जबकि मनु का चेहरा हमेशा खिला रहता था और उन्होंने समाज सेवा को अपना कर्म बना लिया था। मनु का रिश्ता महाराष्ट्र राज्य बाल विकास परिषद और सूरत के कस्तूरबा सेवाश्रम से रहा है। आजकल मनु की बेटी उर्मि डाॅक्टर हैं और अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर भूपत देसाई से उनका विवाह हुआ है, उनके दो बच्चे हैं - मृणाल और रेनु। बापू, जिसे आजकल महात्मा गांधी कहते हैं, उन्हें सारी दुनिया जानती है, लेकिन मनु को कोई नहीं जानता, जिन्होंने बलात्कारी पिता को भी इस्लाम की लत छुड़ाकर वेदों के रास्ते पर लाकर माफ कर दिया था। साभार- वेद वृक्ष की छाया तले, लेखिका फरहाना ताज। गांधी के वह पत्र भी उपलब्ध हैं जिसमें स्वीकार किया गया है कि उसके पुत्र हीरा लाल उर्फ अब्दुल्लाह ने अपने बेटी मनु को हवश का शिकार बनाया था...यह पत्र नीलाम हुए थे। बा को इंजेक्शन ने लगवाने वाली बात फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखी है कि गांधी ने उनको मरवा दिया अपनी हठ से। इस काले सच को कैसे बदलोगे

बुधवार, 6 मई 2020

हिन्दू (part 2)

[06/05, 10:31 PM] वैष्णवमहाराज: वेटिकन शहर की संरचना और शिवलिंग की आकृति में एक गजब की समानता है। इस तस्वीर को देखकर  आप समझ सकते हैं कि हिन्दुओं के पवित्र प्रतीक शिवलिंग और वेटिकन शहर के प्रांगण की रचना में अचंभित कर देने वाली समानता है। शिव के माथे पर  तीन रेखाएं (त्रिपुंडर) और एक बिन्दु होती हैं, ये रेखाएं शिवलिंग पर भी समान रूप से अंकित होती हैं। ध्यान से देखने पर आपको समझ आएगा कि जिन तीन रेखाओं और एक बिन्दू का जिक्र यहां कर रहे हैं वह पिआज़ा सेन पिएट्रो के रूप में वेटिकन शहर के डिजाइन में समाहित है।
[06/05, 10:32 PM] वैष्णवमहाराज: कंबोडिया का हिन्दू सम्राज्य : विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर परिसर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक कंबोडिया में स्थित है। यह कंबोडिया के अंकोर में है जिसका पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मन्दिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिवमंदिरों का निर्माण किया था। कंबोडिया में बड़ी संख्या में हिन्दू और बौद्ध मंदिर हैं, जो इस बात की गवाही देते हैं कि कभी यहां भी हिन्दू धर्म अपने चरम पर था।
[06/05, 10:33 PM] वैष्णवमहाराज: *पौराणिक काल का कंबोजदेश कल का कंपूचिया और आज का कंबोडिया। पहले हिंदू रहा और फिर बौद्ध हो गया। सदियों के काल खंड में 27 राजाओं ने राज किया। कोई हिंदू रहा, कोई बौद्ध। यही वजह है कि पूरे देश में दोनों धर्मों के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। भगवान बुद्ध तो हर जगह हैं ही, लेकिन शायद ही कोई ऐसी खास जगह हो, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई न हो और फिर अंगकोर वाट की बात ही निराली है। ये दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है।*
[06/05, 10:34 PM] वैष्णवमहाराज: विश्व विरासत में शामिल अंगकोर वाट मंदिर-समूह को अंगकोर के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बारहवीं सदी में बनवाया था। चौदहवीं सदी में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने पर शासकों ने इसे बौद्ध स्वरूप दे दिया। बाद की सदियों में यह गुमनामी के अंधेरे में खो गया। एक फ्रांसिसी पुरातत्वविद ने इसे खोज निकाला। आज यह मंदिर जिस रूप में है, उसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का बहुत योगदान है। सन् 1986 से 93 तक एएसआई ने यहाँ संरक्षण का काम किया था। अंगकोर वाट की दीवारें रामायण और महाभारत की कहानियाँ कहती हैं।
[06/05, 10:34 PM] वैष्णवमहाराज: यह मंदिर लगभग 1 स्क्वेयर मील क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहां की दीवारों पर पर छपे चित्र और उकेरी गई मूर्तियां हिन्दू धर्म के गौरवशाली इतिहास की कहानी को बयां करती हैं। सीताहरण, हनुमान का अशोक वाटिका में प्रवेश, अंगद प्रसंग, राम-रावण युद्ध, महाभारत जैसे अनेक दृश्य बेहद बारीकी से उकेरे गए हैं। अंगकोर वाट के आसपास कई प्राचीन मंदिर और उनके भग्नावशेष मौजूद हैं। इस क्षेत्र को अंगकोर पार्क कहा जाता है। सियाम रीप क्षेत्र अपने आगोश में सवा तीन सौ से ज्यादा मंदिर समेटे हुए है।
[06/05, 10:35 PM] वैष्णवमहाराज: *अफ्रीकी में हिन्दू : भगवान शिव कहां नहीं हैं? कहते हैं कण-कण में हैं शिव, कंकर-कंकर में हैं भगवान शंकर। कैलाश में शिव और काशी में भी शिव और अब अफ्रीका में शिव। साउथ अफ्रीका में भी शिव की मूर्ति का पाया जाना इस बात का सबूत है कि आज से 6 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीकी लोग भी हिंदू धर्म का पालन करते थे।*
[06/05, 10:36 PM] वैष्णवमहाराज: 6 हजार वर्षापूर्वी भारतातच नव्हे तर अफ्रिकेत सुद्धा हिन्दू धर्म होता, मग कुणी कसे काय म्हणू शकते की बुद्ध च्या आधी कोणत्याच धर्म अथवा सम्प्रदाय नव्हतां?
[06/05, 10:37 PM] वैष्णवमहाराज: साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा में पुरातत्वविदों को महादेव की 6 हजार वर्ष पुरानी शिवलिंग की मूर्ति मिली जिसे कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता हैरान हैं कि यह शिवलिंग यहां अभी तक सुरक्षित कैसे रहा।

हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची शिवशक्ति की प्रतिमा का अनावरण दक्षिण अफ्रीका में किया गया। इस प्रतिमा में भगवान शिव और उनकी शक्ति अर्धांगिनी पार्वती भी हैं। बेनोनी शहर के एकटोनविले में यह प्रतिमा स्थापित की गई। हिन्दुओं के आराध्य शिव की प्रतिमा में आधी आकृति शिव और आधी आकृति मां शक्ति की है।

10 कलाकारों ने 10 महीने की कड़ी मेहनत के बाद इस प्रतिमा को तैयार किया है। ये कलाकार भारत से आए थे। इस 20 मीटर ऊंची प्रतिमा को बनाने में 90 टन के करीब स्टील का इस्तेमाल हुआ है।

चीन में हिन्दू : चीन के इतिहासकारों के अनुसार चीन के समुद्र से लगे औद्योगिक शहर च्वानजो में और उसके चारों ओर का क्षे‍त्र कभी हिन्दुओं का तीर्थस्थल था। वहां हजारो वर्ष पूर्व के निर्मित हिन्दू मंदिरों के खंडहर पाए गए हैं। इसका सबूत चीन के समुद्री संग्रहालय में रखी प्राचीन मूर्तियां हैं।

यजीदी हिन्दू है? : इस्लामिक आतंकवाद के चलते यजीदी अब खत्म हो रही मनुष्य की विशिष्ट प्रजाति में शामिल हो चुके हैं। यजीदी धर्म भी विश्व की प्राचीनतम धार्मिक परंपराओं में से एक है। इस कुछ इतिहासकार हिन्दू धर्म का ही एक समाज मानते हैं। यजीदियों की गणना के अनुसार अरब में यह परंपरा 6,763 वर्ष पुरानी है अर्थात ईसा के 4,748 वर्ष पूर्व यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों से पहले से यह परंपरा चली आ रही है। यजीदी मंदिर की इस तस्वीर से यह सिद्ध हो जाएगा कि ये सभी हिन्दू हैं।

हिन्दुओं की तरह ही यजीदियों में जल का महत्व है। धार्मिक परंपराओं में जल से अभिषेक किए जाने की परंपरा है। तिलक लगाते हैं और अपने मंदिर में दीपक जलाते हैं। हिन्दू देतता कार्तिकेय जैसे दिखाई देने वाले देवता की पूजा करते हैं। उनके मंदिर और हिन्दुओं के मंदिर समान नजर आते हैं। पुनर्जन्म को मानते हैं। यजीदी अपने ईश्‍वर की 5 समय प्रार्थना करते हैं। सूर्योदय व सूर्यास्त में सूर्य की ओर मुंह करके प्रार्थना की जाती है। स्वर्ग-नरक की मान्यता भी है। धार्मिक संस्कार कराने वाले विशेषज्ञों की परंपरा है। व्रत, मेले, उत्सव की परंपरा भी है। समाधियां व पूजागृह (मंदिर) भी हैं

रूस में हिन्दू : एक हजार वर्ष पहले रूस ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। माना जाता है कि इससे पहले यहां असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था और उससे भी पहले संगठित रूप से वैदिक पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। वैदिक धर्म का पतन होने के कारण यहां मनमानी पूजा और पुजारियों का बोलबाला हो गया अर्थात हिन्दू धर्म का पतन हो गया।

यही कारण था कि 10वीं शताब्दी के अंत में रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर चाहते थे कि उनकी रियासत के लोग देवी-देवताओं को मानना छोड़कर किसी एक ही ईश्वर की पूजा करें। इसके बाद रूसी राजा व्लादीमिर ने यह तय कर लिया कि वह और उसकी कियेव रियासत की जनता ईसाई धर्म को ही अपनाएंगे

रूस की कियेव रियासत के राजा व्लादीमिर ने जब आर्थोडॉक्स ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी जनता से भी इस धर्म को स्वीकार करने के लिए कहा तो उसके बाद भी कई वर्षों तक रूसी जनता अपने प्राचीन देवी और देवताओं की पूजा भी करते रहे थे। बाद में ईसाई पादरियों के निरंतर प्रयासों के चलते रूस में ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो सका है और धीरे-धीरे रूस के प्राचीन धर्म को नष्ट कर दिया गया।

महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है।

अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है। यह विष्णु की मूर्ति शायद वही मूर्ति है जिसे ललितादित्य ने स्त्री राज्य में बनवाया था।

2007 को यह विष्णु मूर्ति पाई गई। 7 वर्षों से उत्खनन कर रहे समूह के डॉ. कोजविनका कहना है कि मूर्ति के साथ ही अब तक किए गए उत्खनन में उन्हें प्राचीन सिक्के, पदक, अंगूठियां और शस्त्र भी मिले हैं।

*वानर साम्राज्य का रहस्य :*
*वानर का शाब्दिक अर्थ होता है 'वन में रहने वाला नर।' वन में ऐसे भी नर रहते थे जिनको पूछ निकली हुई थी। नए शोधानुसार प्रभु श्रीराम का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ था। श्रीराम के जन्म के पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था अर्थात आज (मई 2020) से लगभग 7134 वर्ष पूर्व हनुमानजी का जन्म हुआ था। शोधकर्ता कहते हैं कि आज से 9 लाख वर्ष पूर्व एक ऐसी विलक्षण वानर जाति भारतवर्ष में विद्यमान थी, जो आज से 15 से 12 हजार वर्ष पूर्व लुप्त होने लगी थी और अंतत: लुप्त हो गई। इस जाति का नाम कपि था। हनुमान का जन्म कपि नामक वानर जाति में हुआ था*

*ये सभी बाते पुरातत्ववेत्ता अनुसंधायक एकमत से स्वीकार करते हैं*

हिन्दू (part 1)

हिन्दू धर्म के 90 हजार से भी ज्यादा वर्षों के लिखित इतिहास में लगभग 20 हजार वर्ष पूर्व नए सिरे से वैदिक धर्म की स्थापना हुई और नए सिरे से सभ्यता का विकास हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मा और उनके पुत्रों ने धरती पर विज्ञान, धर्म, संस्कृति और सभ्यता का विस्तार किया। इस दौर में शिव और विष्णु सत्ता, धर्म और इतिहास के केंद्र में होते थे। देवता और असुरों का काल अनुमानित 20 हजार ईसा पूर्व से लगभग 7 हजार ईसा पूर्व तक चला। फिर धरती के जल में डूब जाने के बाद ययाति और वैवस्वत मनु के काल और कुल की शुरुआत हुई।

दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं से हिन्दू धर्म का कनेक्शन था। संपूर्ण धरती पर हिन्दू वैदिक धर्म ने ही लोगों को सभ्य बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक विचारधारा की नए-नए रूप में स्थापना की थी। आज दुनियाभर की धार्मिक संस्कृति और समाज में हिन्दू धर्म की झलक देखी जा सकती है चाहे वह यहूदी, यजीदी, रोमा, पारसी, बौद्ध धर्म हो या ईसाई-इस्लाम धर्म हो।

भारतीय लोगों ने इस दौर में विश्‍वभर में विशालकाय मंदिर, भवन और नगरों का निर्माण कार्य किया किया था। हिन्दू धर्म ने अपनी जड़ें यूरोप से लेकर एशिया तक फैला रखी थी, जिसके प्रमाण आज भी मिलते हैं। आज हम आपको विश्व की ऐसी ही जगहों के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि यहां कभी हिन्दू धर्म अपने चरम पर हुआ करता था।

सिन्धु-सरस्वती घाटी की हड़प्पा एवं मोहनजोदोड़ो सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व) : हिमालय से निकलकर सिन्धु नदी अरब के समुद्र में गिर जाती है। प्राचीनकाल में इस नदी के आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं। इस नदी के किनारे के दो स्थानों हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) में की गई खुदाई में सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले। इसके बाद चन्हूदड़ों, लोथल, रोपड़, कालीबंगा (राजस्थान), सूरकोटदा, आलमगीरपुर (मेरठ), बणावली (हरियाणा), धौलावीरा (गुजरात), अलीमुराद (सिंध प्रांत), कच्छ (गुजरात), रंगपुर (गुजरात), मकरान तट (बलूचिस्तान), गुमला (अफगान-पाक सीमा) आदि जगहों पर खुदाई करके प्राचीनकालीन कई अवशेष इकट्ठे किए गए। अब इसे सैंधव सभ्यता कहा जाता है।

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में असंख्य देवियों की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की हैं। प्राचीनकाल से ही मातृ या प्रकृति की पूजा भारतीय करते रहे हैं और आधुनिक काल में भी कर रहे हैं। यहां हुई खुदाई से पता चला है कि हिन्दू धर्म की प्राचीनकाल में कैसी स्थिति थी।

हड़प्पा से कई ऐसी ही चीजें मिली हैं, जिन्हें हिन्दू धर्म से जोड़ा जा सकता है। पुरोहित की एक मूर्ति, बैल, नंदी, मातृदेवी, बैलगाड़ी और शिवलिंग। 1940 में खुदाई के दौरान पुरातात्विक विभाग के एमएस वत्स को एक शिव लिंग मिला जो लगभग 5000 पुराना है। शिवजी को पशुपतिनाथ भी कहते हैं।

बाली का प्राचीन मंदिर : इंडोनेशिया कभी हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था, लेकिन इस्लामिक उत्थान के बाद यह राष्ट्र आज मुस्लिम राष्ट्र है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जहां आज इंडोनेशियन इस्लामिक यूनिवर्सिटी है वहां कभी हिन्दू मंदिर हुआ करता था, जिसमें शिव और गणेश की पूजा की जाती थी। यहां से एक ऐतिहासिक शिवलिंग भी मिला है।

इंडोनेशिया के एक द्वीप है बाली जो हिन्दू बहुल क्षेत्र है। यहां के हिन्दुओं ने अपने धर्म और संस्कृति को नहीं छोड़ा था। बाली में एक इमारत के निर्माण की खुदाई के दौरान मजदूरों को मंदिर के कुछ अंश मिले जिसके बाद यह खबर बाली के ऐतिहासिक संरक्षण विभाग को दी गई जिसने खुदाई करने पर एक विशाल हिन्दू इमारत को पाया, जो कभी हिन्दू धर्म का केंद्र था। यह विशालकाय मंदिर आज बाली द्वीप की पहचान बन गया है।

इंडोनेशिया के द्वीप बाली द्वीप पर हिन्दुओं के कई प्राचीन मंदिर हैं, जहां एक गुफा मंदिर भी है। इस गुफा मंदिर को गोवा गजह गुफा और एलीफेंटा की गुफा कहा जाता है। 19 अक्टूबर 1995 को इसे विश्व धरोहरों में शामिल किया गया। यह गुफा भगवान शंकर को समर्पित है। यहां 3 शिवलिंग बने हैं। देश-विदेश से पर्यटक इसे देखने आते हैं।

शंकर पुत्र सुकेश के तीन पुत्र थे- माली, सुमाली और माल्यवान। माली, सुमाली और माल्यवान नामक तीन दैत्यों द्वारा त्रिकुट सुबेल (सुमेरु) पर्वत पर बसाई गई थी लंकापुरी। माली को मारकर देवों और यक्षों ने कुबेर को लंकापति बना दिया था। रावण की माता कैकसी सुमाली की पुत्री थी। अपने नाना के उकसाने पर रावण ने अपनी सौतेली माता इलविल्ला के पुत्र कुबेर से युद्ध की ठानी थी और लंका को फिर से राक्षसों के अधीन लेने की सोची।

रावण ने सुंबा और बाली द्वीप को जीतकर अपने शासन का विस्तार करते हुए अंगद्वीप, मलय द्वीप, वराह द्वीप, शंख द्वीप, कुश द्वीप, यव द्वीप और आंध्रालय पर विजय प्राप्त की थी। इसके बाद रावण ने लंका को अपना लक्ष्य बनाया। लंका पर कुबेर का राज्य था, परंतु पिता ने लंका के लिए रावण को दिलासा दी तथा कुबेर को कैलाश पर्वत के आसपास के त्रिविष्टप (तिब्बत) क्षेत्र में रहने के लिए कह दिया। इसी तारतम्य में रावण ने कुबेर का पुष्पक विमान भी छीन लिया। *आज के युग अनुसार रावण का राज्य विस्तार, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, दक्षिण भारत के कुछ राज्य और संपूर्ण श्रीलंका पर रावण का राज था।*

वेटिकन शहर का शिवलिंग : कुछ लोग कहते हैं कि वेटिकन तो वाटिका का बिगड़ा रूप है। वैदिक काल में यह स्थान भी हिन्दू धर्म का केंद्र हुआ करता था। यहां पुरातात्विक खुदाई के दौरान शिवलिंग प्राप्त हुआ है जो रोम के ग्रेगोरियन इट्रस्केन संग्रहालय (Gregorian Etruscan Museum) में रखा गया है।

यह भी कहा जाता है कि वेटिकन सिटी का मूल स्वरूप शिवलिंग के समान ही है। इतिहासकार पी.एन.ओक ने अपने शोध में यह दावा किया है कि धर्म चाहे कोई भी हो उसका उद्भव सनातन धर्म यानि की हिन्दू धर्म में से ही हुआ है।

अपने दावो को  आधार देने के लिए पी.एन.ओक ने कई उदाहरण भी पेश किए हैं जिनमें से रोम का वेटिकन शहर प्रमुख है। ओक का कहना है कि वेटिकन शब्द की उत्पत्ति हिन्दी के ‘वाटिका’ शब्द से हुई है। इतना ही नहीं उनका  कहना है कि ईसाई धर्म यानि ‘क्रिश्चैनिटी’ को भी सनातन धर्म की ‘कृष्ण नीति’ और अब्राहम को ‘ब्रह्मा’ से ही लिया गया है। पी.एन.ओक का कहना है कि इस्लाम और ईसाई, दोनों ही धर्म वैदिक मान्यताओं के विरुपण से जन्में हैं।