सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

भगवान जन्म क्यों लेते हैं? गर्भ से जन्म क्या बंधन है या मुक्ति?

मनुष्य के मन में सदैव एक गहरा प्रश्न उठता है — भगवान जन्म क्यों लेते हैं? गर्भ से जन्म क्या बंधन है या मुक्ति? मुक्ति क्या है और अज्ञान क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दर्शन का विषय नहीं, बल्कि जीवन को समझने की कुंजी है।
भगवान का जन्म और जीव का जन्म
हिंदू दर्शन के अनुसार भगवान वास्तव में जन्म नहीं लेते, बल्कि प्रकट होते हैं। उनका प्राकट्य कर्म के बंधन से नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से होता है। जब धर्म की स्थापना या मानवता का मार्गदर्शन आवश्यक होता है, तब वे अवतार के रूप में गर्भ से जन्म लेते दिखाई देते हैं। यह जन्म लीला है, बंधन नहीं।
इसके विपरीत सामान्य जीव का जन्म कर्म का परिणाम होता है। पिछले कर्मों के अनुसार आत्मा नया शरीर धारण करती है। इसलिए जीव के लिए गर्भ संसार में प्रवेश का द्वार है — कर्म, अनुभव और पुनर्जन्म का चक्र।
इस प्रकार भगवान का जन्म स्वतंत्रता का प्रतीक है, जबकि जीव का जन्म बंधन का परिणाम।
गर्भ से जन्म — बंधन या मुक्ति?
जन्म स्वयं बंधन नहीं है। जन्म तो एक अवसर है।
अज्ञान की अवस्था में जन्म बंधन बन जाता है, क्योंकि मनुष्य स्वयं को शरीर मानकर इच्छाओं, आसक्ति और कर्मों में उलझ जाता है। यही जन्म-मृत्यु का चक्र चलाता है।
परंतु ज्ञान की अवस्था में यही जन्म मुक्ति का साधन बन सकता है। मानव जीवन साधना, आत्मबोध और सत्य की प्राप्ति का माध्यम है। इसलिए जन्म का स्वरूप हमारी चेतना पर निर्भर करता है।
मुक्त अवस्था (मोक्ष)
मुक्ति का अर्थ है — जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता। यह वह अवस्था है जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है, कर्ता भाव मिट जाता है और मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है।
मुक्त व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी शरीर से बंधा नहीं होता। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु उसके लिए समान हो जाते हैं। भीतर स्थायी शांति और कारण रहित आनंद का अनुभव होता है।
मुक्ति दो प्रकार की कही गई है — जीवनमुक्ति, जहाँ व्यक्ति जीवित रहते हुए मुक्त होता है, और विदेहमुक्ति, जहाँ शरीर छोड़ने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता।
वास्तव में मुक्ति कहीं जाना नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है।
अज्ञान क्या है?
अज्ञान का अर्थ केवल जानकारी की कमी नहीं है। अज्ञान का मूल है — स्वयं को गलत पहचानना।
जब मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, पद या संबंध मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल जाता है। अस्थायी वस्तुओं को स्थायी समझना, सुख को बाहरी वस्तुओं में खोजना और “मैं करता हूँ” का अहंकार — यही अज्ञान के रूप हैं।
उपनिषद कहते हैं कि आत्मा को न जानना ही अविद्या है। इसी अज्ञान से इच्छा, कर्म, बंधन और दुःख उत्पन्न होते हैं।
ज्ञान और अज्ञान का संबंध
अज्ञान अंधकार के समान है और ज्ञान प्रकाश के समान। जैसे प्रकाश आते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से अज्ञान मिट जाता है। सत्य नया उत्पन्न नहीं होता, केवल भ्रम समाप्त होता है।
निष्कर्ष
जीव का जन्म कर्म से बंधन है, भगवान का जन्म लीला है, और मानव जन्म मुक्ति का अवसर है। अज्ञान बंधन का कारण है और ज्ञान मुक्ति का मार्ग। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब जन्म और मृत्यु दोनों का भय समाप्त हो जाता है।
अंततः आध्यात्मिक यात्रा बाहर कुछ पाने की नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की यात्रा 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

वास्तु शांति पूजा सामग्री

हल्दी कुंकुम गुलाल रंगोली चन्दन 50 ग्राम अगरबत्ती भीमसेनी कपूर 100 ग्राम जनेऊ अत्तार की शीशी नारियल जटावाले 8 चावल 2 किलो गेहूं 1 किलो सुपारी सफ़ेद 150 मिश्री 100 ग्राम चीनी 500 ग्राम गुड़ 200 ग्राम सूखा नारियल ४ मिक्स मिठाई 500 ग्राम गाय का घी 1 किलो पिली सरसो 50 ग्राम काले तिल ५० ग्राम उड़द 50 ग्राम सात प्रकार का अनाज (सवा सवा किलो ) 5 प्रकार के फल केले 12 छुट्टे फूल 1 किलो फूलो की माला 5 गुलाब के फूल 10 हवन लकड़ी 2 किलो गोबर के कंडे 4 पैकेट गायत्री हवन सामग्री 500 ग्राम कच्चा धागा बण्डल मौली बण्डल 160 (1 या 2 रूपये के सिक्के शहद 100 ग्राम आम के पत्ते ४ लोहे की कील 3 इंच लम्बे हवन कुंड या 16 ईंटे माचिस दिया नीरांजन घी में भीगी हुई बत्तिया 15 - 20 बाजोट 6 कलश के लिए ताम्बे के लोटे 5 6 ब्लाउज पीस (लाल, पीला, हरा, सफ़ेद 2 , नीला ) लाल सूती वस्त्र 1 मीटर सफ़ेद सूती वस्त्र 2 मीटर सुहाग का साहित्य 1 टॉवल नया 1 साडी सोने की अथवा चांदी की वास्तु प्रतिमा सोने की शलाका पंचरत्न

रविवार, 2 नवंबर 2025

दिल के नैना देख उघार , घट में पावेगा दिलदार ।। धृ।। बैठ एकांत शोध कर पूरा प्रवृत्ति को कर दे दुरा निवृत्ति में सुरति धार ।। १।। छूट जावे माया का थारा मिट जायेगा घोर अँधेरा फिर दिलदार की सूरत निहार ।। २।। दल ऊपर दल चढ़ जा ख़ासा आखरी दल पर कर ले बासा अनहद नाद की सुन झंकार ।। ३।। लालदास का वो रखवारा श्याम सलोना सुन्दर प्यारा मिल उनसे हो बेड़ापार ।। 4

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने

रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है, जो पेड़ हमने लगाया पहले, उसी का फल हम अब पा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ इसी धरा से शरीर पाए, इसी धरा में फिर सब समाए, है सत्य नियम यही धरा का, है सत्य नियम यही धरा का, एक आ रहे है एक जा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ जिन्होने भेजा जगत में जाना, तय कर दिया लौट के फिर से आना, जो भेजने वाले है यहाँ पे, जो भेजने वाले है यहाँ पे, वही तो वापस बुला रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ बैठे है जो धान की बालियो में, समाए मेहंदी की लालियो में, हर डाल हर पत्ते में समाकर, हर डाल हर पत्ते में समाकर, गुल रंग बिरंगे खिला रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥ रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है, जो पेड़ हमने लगाया पहले, उसी का फल हम अब पा रहे है, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, वही ये सृष्टि चला रहे है ॥

दिल खो गया श्री वुन्दावन में

दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया दिल खो गया 
बांके बिहारी श्री वृन्दावन में हाय मेरा दिल खो गया

होता नित रास यहाँ संतो का वास यहाँ 
सदा भाव और भक्ति का अहसास यहाँ 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।१।। 

यहाँ यमुना किनारा है श्री निधिवन प्यारा है 
कण कण में बिहारी जी, यहाँ तेरा नजारा है 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।। २।। 

देखा जबसे तुमको मैं हो गया दीवाना 
नहीं होश रहा कोई हुआ खुद से बेगाना 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।३।। 

कहे निखिल सौरभ प्यारे कभी दिल से ना बिसराना
निखिल बस तेरा है हर जनम में अपना लेना 
दिल खो गया बांके बिहारी श्री वृन्दावन में 
हाय मेरा दिल खो गया ।।४ ।।

शनिवार, 2 सितंबर 2023

सिद्ध मंत्र साधना

ॐ 

ॐ नमो सिद्धाय सर्व अरिष्ट निवारनाय
सर्व कार्य सिद्ध कराय ॐ सिद्धाय नमः

ॐ सिद्ध गणेशाय नमः
ॐ सिद्ध सरस्वती माताय नमः
ॐ सिद्धेश्वराय नमः
ॐ सिद्धेश्वरी माताय नमः
ॐ सिद्ध विष्णु देवाय नमः
ॐ सिद्ध महालक्ष्मी माताय नमः
ॐ सिद्ध दत्तात्रेयाय नमः
ॐ सिद्ध गोरक्षनाथाय नमः
ॐ सिद्ध स्वामी हरदासाय नमः
ॐ सिद्ध गुरुदेवाय नमः
ॐ सिद्धाय नमः

ॐ नमो सिद्धाय सर्व अरिष्ट निवारनाय
सर्व कार्य सिद्ध कराय ॐ सिद्धाय नमः

ॐ नमो सिद्धाय सर्व समर्थाय
संसार सर्व दुःख क्षय कराय
सत्व गुण आत्मबल दायकाय, मनो वांछित फल प्रदायकाय
ॐ सिद्ध सिद्धेश्वराय नमः

सिद्ध सिद्धेश्वर शांति दायक तू शांतिदायक तू
सुख कारक सिद्ध विघ्न हर तू सिद्ध विघ्न हर तू
सिद्धियों के ईश्वर सिद्धेश्वर तू सिद्धेश्वर तू
रिद्धि सिद्धि दायक सिद्ध गुरु तू सिद्ध गुरु तू
श्रद्धा भक्ति दायक सिद्ध साईं तू सिद्ध साई तू
कृपा छत्र दाता सिद्ध गोरक्ष तू सिद्ध गोरक्ष तू
सिद्ध सिद्धेश्वर शांति दायक तू शांतिदायक तू

ॐ शांति शांति शांति

सिद्ध प्रार्थना

हे सर्व शक्तिमान

मैं आपकी अज्ञान बालक हु

मेरे शरीर मे आपका निवास हो

मेरे सब कर्म आपकी सेवा हो

कर्मो से उतपन्न पापो की क्षमा हो

मैं आपकी अज्ञान बालक हु

ॐ शांति शांति शांति


है सर्व शक्तिमान

मैं आपसे प्रार्थना करती हूं

मेरे दुर्गुण दुराचार मिटाओ

काम क्रोध लोभ को समाप्त करो

मोह मद मत्सर का अंत करो

मैं आपसे प्रार्थना करती हूं

ॐ शांति शांति शांति


है सर्व शक्तिमान

मैं आपकी शरण मे आयी हु

कर्मेन्द्रियों को अच्छी कार्य शक्ति दो

ज्ञानेन्द्रियो को अच्छी ज्ञान शक्ति दो

मन बुद्धि को अच्छी आत्म शक्ति दो

मैं आपकी शरण मे आयी हु

ॐ शांति शांति शांति


है सर्व शक्तिमान

मैं आत्मसमर्पण करती हूं

सद्गुण प्रेरणा आत्मबल दो

ध्येय प्राप्ति का सिद्ध मार्ग दिखाओ

सुख शांतिदायक कर्म कराओ

मैं आत्म समर्पण करती हूं

ॐ शांति शांति शांति


है सर्व शक्तिमान

मैं आपकी कृपाभिलाषी हु

आप माता हो मा की ममता दो

आप पिता हो पिता का प्यार दो

आप गुरु हो समर्थ बनाओ

मैं आपकी कृपाभिलाषी हु

ॐ शांति शांति शांति